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फ़िल्म रिव्यु :- पैरासाइट PARASITE

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                 # PARASITE(#पैरासाइट) पैरासाइट हिन्दी में कहें तो परजीवी, पहली बार यह शब्द 8वीं में सुना और पढ़ा था।पैरासाइट का उदाहरण मैंने अमरबेल और कोयल याद किया था विज्ञान की भाषा में कहें तो पैरासाइट वैसे जीव को कहते हैं जो दूसरे जीव पर निर्भर करता हो,वो अपने होस्ट को प्रत्यक्ष रूप से नुकसान नहीं पहुँचाता बल्कि धीरे धीरे उसके सारे न्यूट्रेन्ट्स ग्रहण कर लेता हैं जिससे होस्ट कमजोर हो जाता हैं ,उसे कोई दूसरी बीमारी हो जाती हैं और वो समाप्त हो जाता हैं।. दूसरी बार मैंने फ़िल्म दोस्ती में करीना कपूर को अक्षय कुमार को पैरासाइट कहते हुए सुना था।उस वक्त मैं पैरासाइट का मतलब समझ चुका था।    PARASITE #पैरासाइट एक बहुचर्चित कोरियन सिनेमा हैं। सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म का सम्मान भी प्राप्त हुआ। साथ हीं सर्वश्रेष्ठ निर्देशक - मोशन पिक्चर, सर्वश्रेष्ठ पटकथा - मोशन पिक्चर के लिए नामित भी किया गया। इसके डायरेक्टर 'Bong Joon-ho' हैं। जो इस तरह की फिल्में बनाते रहतें हैं। दक्षिण कोरिया तकनीक के मामले में अभी जापान और चीन से भी ...

हम देखेंगे अखिल भारतीय कन्वेंशन 1मार्च 2020

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          हम देखेंगे       अखिल भारतीय कन्वेंशन 1मार्च 2020 टीम अँधेरे में क्या लोग गीत गाएँगे? मैं थोड़ी देर तक सोचने लगा कि इसका जबाब क्या दूं। फिर वहीं जबाब देते हैं कि "अँधेरे में लोग अँधेरे के गीत गाएँगे" इसके बाद मैं फिर सोच में पर गया।  संजीव sir यह बात कार्यक्रम के शुरू में हुई थी और मुझे कार्यक्रम के समापन में समझ आया। मैं सोचता रहता था कि ये कैसी दो व्यक्ति की सरकार हैं जो सड़को पर बढ़ रही भीड़ को नहीं देख पा रहीं।जब विभिन्न भाषा ,बोली, साहित्य ,कला या अनेक विधा से जुड़े लोगों को एक मंच से हुंकार भरते हुए देखा, तो समझा सबकी समस्या एक जैसी ही हैं। बस वो अपने दुःख दर्द को अलग-अलग भाषा माध्यम से व्यक्त कर रहें हैं। हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू ,कन्नड़, तमिल आदि सभी भाषा ने स्त्री के दबे दर्द को दिखाया। एकता का सूत्र दिया।आजदी का मतलब समझाया,इंकलाब की भावना को जागृत किया। अपनी कला प्रस्तुत करती छात्रा    "संघर्ष व्यक्ति को पैना(तेज) बना देता हैं।"  वर्तमान तंत्र अपनी कुंठित मानसिकता की वजह से हम भारतीय...

दूर के ट्रोल सुहाने

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#दूर_के_ट्रोल_सुहाने - #आशुतोष_उज्ज्वल  #प्रकाशक:-#प्रतिभा_प्रतिष्ठान व्यंगकार वह चतुर प्राणी हैं जो समाज ,सरकार ,बुराइयों को सीधा चुनौती ना देकर व्यंग का मार्ग अपनाता हैं,उस पर आक्षेप करता हैं।  व्यंगकार वह डरपोक जीव हैं जो शाम में लौकी या टिंडे खाने की डर से बाहर ही खा कर घर आता हैं,और मोहतरमा से कहता हैं कि आज सुबह से ही पेट मे कुछ गुड़ गुड़ कर रहा हैं।                                         व्यंगकार व्यंग क्यों करता है? क्योंकि वह चतुर हैं,डरपोक हैं?,हँसोड़ हैं?,या फिर हैं?वह संवेदनशील ....................पता नहीं, वह क्या हैं? वह इन सब में से सबकुछ हो सकता हैं?या फिर कुछ भी नहीं?,पर एक बात तय हैं कि उसने सभी चीजों(समाज,सरकार ,बुराई) को नाना(विभिन्न) प्रकार से देखा होता हैं क्योंकि उसके पास खाली समय होता हैं।(मैं व्यंगकार को बेला नहीं कह रहा)                 इस किताब को क्यों पढ़ा जाना चाहिए?इसकी खासियत क्या हैं? ...

क़ाबर के पाँच कुमार

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                                       क़ाबर के पाँच कुमार  जय माँ जयमंगला श्रद्धा जहाँ बसें माता वहीं मिले 9.21AM 24 दिसंबर 2019 जब मोबाइल डेटा on किया तो व्हाट्सअप्प पर #रायसाहब ग्रुप में वार्त्तालाप हो रही थी कि जयमंगलागढ़ (क़ाबर झील/टाल) जाना हैं। अंतिम निर्णय के लिए मेरा इंतजार हो रहा था। मैंने देखा और हामी भर दी। यात्रा का समय पहले ही एक मित्र ने 10 बजे तय कर लिया था।मेरे पास 39 मिनट थे तैयार होने के और मैं 30 मिनट में तैयार होकर 9 मिनट पहले निर्धारित स्थान पर खड़ा हो गया।(कम समय में तैयार होने का गुण कॉलेज जाने की वजह से हैं।)                                                                   इससे एक दिन पहले संध्या के समय हम सभी iti (बेगूसराय, iti) में बैठकर कुछ राजनीतिक बहस कर रहें थे।जिस ...
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                  बोलना ही है:-रवीश कुमार अभी रात के ढाई बजे है (2.30) इस वक्त 20 साल का मेरे जैसा युवा दिल्ली की हल्की सी ठंड में पतली चादर ओढ़े अपनी महबूबा से फोन पर बातें कर रहा होगा या फिर सपने में उसकी हल्की सी मुस्कान को अपने अनुसार समझ रहा होगा।,या फिर upsc iit ,medical या भविष्य के बारे में सोच रहा होगा। जबकि मेरी नींद उड़ी हुई है।           मेरी नींद किसी प्रेमिका के लिए नही उड़ी मेरी नींद उड़ी अपने भारत की दुर्दशा को देख कर ,युवा छात्रों पर चल रही लाठी को महसूस कर। किसानों के आत्महत्या को सोचकर ,पुलिस और वकील की लड़ाई को देखकर, मैं जाग रहा हूँ सोच रहा हूँ क्या करूँ? कौन सा रास्ता निकालू ?इन सब से कैसे मुक्ति पाउ??। बेचैन हूँ।कभी कभी तो रोने तक का मन कर जाता है।                          इसे लिखने से पहले मैं एक किताब पढ़ रहा था। #बोलना_ही_है।जिसे लिखा है :-रैमॉन मैगसेसे अवॉर्ड 2019 से सम्मानित #रवीश_कुमार, मैं उन्हें इस अवार्ड के लिए शुभकामन...

समझना

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                                                  समझना समझना का अर्थ होता है ज्ञान प्राप्त करना ,अनुमान करना ,कल्पना करना,समझौता करना,बदला लेना,चिंतन करना,गहन अध्ययन,प्रतिक्रिया करना इत्यादि। जब हम किसी विषय को समझने की कोशिस करते है तो हमारे माथे पर शिकन उत्पन्न होता है।जिस विषय को हम समझने वाले होते है अगर उसे हम आसानी से नही समझ पाते है तो भौंऐ में सिकुड़न होती है।हमारी आँखे उस विषय को देखने के लिए उत्सुक होती है, जिसे हम समझने की कोशिस करते  है।अगर वह हमें नही दिखायी देती है तो फिर हम उसकी कल्पना करना शुरू कर देते है।और फिर जैसा हम कल्पना करते है ठीक वैसा ही हमे समझ आता है।           'समझना' किसी भी विषय में निहित ज्ञान को ,जानकारी को वहाँ से निकालकर खुद में जगह देना समझना कहलाता है। यह एक कठिन प्रक्रिया है परंतु अभ्यासरत होने पर यह आसान हो जाता है जैसे हम साँस लेते है, दर्द होने पर आँखों से आँसू आते है। यह...

स्कूल से मेरी नफरत

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#स्कूल से मेरी नफरत --01       यही अगस्त का महीना था , मैं 8th क्लास में था , छोटी दी 10th में , मैं ,छोटी दी और शालू(मेरे क्लास की साथ ही साथ मेरे घर के बगल की) तीनो स्कूल जा रहे थे। मंगलवार का दिन था ,बारिश बहुत ज्यादा हो रही थी।                           मंगलवार का दिन इसलिए मुझे याद है क्योंकि सिर्फ इसी दिन जाते हुए मेरे कपड़े साफ होते थे सिर्फ जाते हुए । आते हुए नही । घर से स्कूल मुश्किल से 1km की दूरी पर होगी । बारिश हुई थी जमकर हुई थी रात से ही हो रही थी , मैं खुश था आज स्कूल नही जाना पड़ेगा , और जब स्कूल का समय आया बारिश छूट गयी। जैसे जैसे बारिश छूट रही थी मेरा मुँह उतर रहा था ,कुछ देर बाद बारिश बिल्कुल छूट गयी और मेरा मुँह प्रकीर्ति के सामने हारे हुए किसान की तरह हो गया था                        मेरी माँ, ना जाने उसे क्या मजा आता था मुझे स्कूल भेजते हुए। कितनी दफा तो मुझे बारिश में भीगते हुए भेजा था ,आज तो बारिश भी छूट गयी थी ,म...