दूर के ट्रोल सुहाने


#दूर_के_ट्रोल_सुहाने - #आशुतोष_उज्ज्वल 
#प्रकाशक:-#प्रतिभा_प्रतिष्ठान


व्यंगकार वह चतुर प्राणी हैं जो समाज ,सरकार ,बुराइयों को सीधा चुनौती ना देकर व्यंग का मार्ग अपनाता हैं,उस पर आक्षेप करता हैं। 
व्यंगकार वह डरपोक जीव हैं जो शाम में लौकी या टिंडे खाने की डर से बाहर ही खा कर घर आता हैं,और मोहतरमा से कहता हैं कि आज सुबह से ही पेट मे कुछ गुड़ गुड़ कर रहा हैं।
                                        व्यंगकार व्यंग क्यों करता है? क्योंकि वह चतुर हैं,डरपोक हैं?,हँसोड़ हैं?,या फिर हैं?वह संवेदनशील ....................पता नहीं, वह क्या हैं? वह इन सब में से सबकुछ हो सकता हैं?या फिर कुछ भी नहीं?,पर एक बात तय हैं कि उसने सभी चीजों(समाज,सरकार ,बुराई) को नाना(विभिन्न) प्रकार से देखा होता हैं क्योंकि उसके पास खाली समय होता हैं।(मैं व्यंगकार को बेला नहीं कह रहा)
                इस किताब को क्यों पढ़ा जाना चाहिए?इसकी खासियत क्या हैं?
                             खासियत-वासियत कुछ नहीं हैं ,ना ही कोई बम फोड़ा गया हैं और ना ही कोई साहित्यिक व्याकर्णिक भाड़ी भड़कम शब्द हैं। आप इसे सपरिवार पढ़ सकते हैं,ऐसी कोई बात नहीं हैं जिससे इसके अंदर नेटफ्लिक्स की वैधानिक चेतावनी लिखना पड़े ,या फिर ये कि ये किताब 18 से ऊपर के ही बच्चे पढ़े। आप इसे अपने घर के सबसे छोटे से सदस्य से भी पढ़वा सकते हैं जो 7वी या 8वी में हो।जन्मदिन में भेंट कर सकते हैं,टेबल पर सजा सकते हैं(क्योंकि इसका आवरण मजाकिया हैं) इस किताब को ना खरीदने और पढ़ने की एक वजह हो सकती हैं..........और वो हैं कि ऐसी कोई वजह नहीं हैं,आपको इसे पढ़ना ही पड़ेगा।
        इस किताब को लिखने में लेखक को कोई खास मेहनत की जरूरत नहीं पड़ी होगी,क्योंकि हमारी वर्तमान सरकारीसमाज को एडवेंचर करने का शौक हैं और उस एडवेंचर का शीर्षक बनाने का एडवेंचर लेखक ने किया हैं।
  दूसरे की बीबी,दूसरे का काम,दूसरे की सैलरी और दूसरे का ट्रोल सुहाने(अच्छे)लगते हैं।"अच्छे" से याद आया कि किसी अच्छे आदमी ने अच्छे से अच्छे-अच्छे वादे किए थे,खैर उस अच्छे आदमी का अच्छे जगहों पर क्या अच्छा जिक्र करना!  अच्छा छोड़ो!
      व्यंगकार और रेल में कुछ सम्बंध तो जरूर हैं तभी तो शरद जोशी,परसाई और उज्ज्वल सभी ने एक व्यंगात्मक लेख रेल पर मढ़ा हैं,शायद इन व्यंगकारो में वीर सावरकर के जैसे अंग्रेजों के आगे गुटने टेक कर "तुम ही मेरे माय-बाप हो कहने का दम ही नहीं हैं।" इन्हें तो अंग्रेजो की दी हुई रेल वर्षों की गुलामी याद दिलाती हैं।
   व्यंगकार और लोकतंत्र का भी पुराना रिश्ता हैं तभी तो परसाई ने ठिठुरता हुआ गणतंत्र लिखा और उज्ज्वल ने लोकतंत्र की नयी परिभाषा दी जिसमें वो कहते हैं:- डेमोक्रेसी का मतलब हैं जनता का तेल निकालकर उसी से जनता की मालिश करना।
पर मुझे लगता हैं कि लिंकन की तरह इनकी परिभाषा में भी तीन बार जनता का कम से कम नाम लिया जाय ,क्योंकि लोकतंत्र में जनता का कोई काम तो रह नहीं गया कम से कम नाम तो रह जाय इसलिए :- ""जनता से जनता का तेल निकालकर जनता की मालिश करना "" हैं।(मेरी तरफ से उज्ज्वल को भेंट यह परिभाषा हैं।)
सेक्स इज गंदी चीज से:-
हमारे देश में सेक्स एक गंदी चीज हैं तभी हर दीवार पर सेक्स से उत्पन्न समस्या का समाधान लिखा होता हैं। सेक्स शब्द जब उत्तर प्रदेश,बिहार के हिन्दी क्षेत्र से गुजरता है तब यह संभोग हो जाता हैं और तब यह और भी गंदी और खतरनाक हो जाती हैं। अँग्रेजी क्षेत्र वालें कभी कभी सेक्स शब्द बोल भी लेते हैं पर हम हिन्दी भाषी कभी नहीं ! हिन्दी पाटी में कोई माय का लाल पैदा नहीं लिया होगा जिसने अपने पिता के सामने संभोग शब्द के उच्चारण किया हों। क्योंकि यह बहुत ही खतरनाक और गंदी चीज हैं।
                      जिस चीज को जैसे होना चाहिए वैसे ना होकर जैसे तैसे हो जाय तो वह मजाक का रूप ले लेता हैं।"आखिर अपने कंधों पर अपना जनाजा लेकर पहुँचते हैं डॉक्टर के पास" ये वहीं मजाकिया आक्षेप था।
 लेखक जितना अच्छे से ग्रामीण जीवन को जिया हैं उतना ही मजे के साथ शहरी जीवन भी तभी लेखक ने लिखा हैं कि ""हम पहला सिप लिये।पुरखे तर गये।इतना गंदा टेस्ट था कि उबकाई आने लगी।""
         मुझे इस किताब को पढ़ते हुए बहुत मजा आया किताब का टेस्ट हाजमोला के चटकार सा था। पढ़ते हुए कभी कभी जोड़ से हँस दिया ,गंभीर हुआ,और समाज के लिए फिक्रमंद भी।
                                                    लेकिन अगले ही क्षण लेखक के नाम के जैसा मन आशुतोष(आशु मतलब तुरन्त और तोष मतलब खुश)हो जाता।    
                         किताब अच्छी हैं।
आशुतोष उज्ज्वल आप हमेशा स्वस्थ रहें,थोड़े हेल्दी दिखें भी,इतनी खूबसूरत किताब की रचना के लिए आपका शुक्रिया!💐 
मैजिकल आयुषी को ढ़ेर सारा प्यार वो अपने पिता के साथ खूब मौज करें☺️💐💐💐💐💐💐

Sachinshvats.

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