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'अमर देसवा' उपन्यास एक नजऱ , AMAR DESWA written by Praveen kumar

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'आपदा में अवसर' यह तो सबकी जुबाँ पर है पर आपदा में नागरिकता, व्यवस्था, मनुष्यता, शासन-प्रशासन की जाँच करती है "अमर देसवा"। हर जगह ईश्वर नहीं पहुँच सकते , इसलिए उन्होंने मानव में मानवता दी। हर व्यक्ति के पास कुछ अधिकार होने चाहिए। जिससे वह आधारभूत चीजों तक अपनी पहुँच सुनिश्चित कर सके। इसलिए राष्ट्र में नागरिकता की बात की गई है। एक अकेले आदमी की वैसी शक्ति जिसमें सभी शक्ति निहित हो। वह अपने समाजिक और राजनीतिक अधिकार को अच्छे से समझता हो। कर्तव्यों को अपने जीवन का आधार मानता हो। लेकिन इस महामारी ने मनुष्यता और नागरिकता दोनों को तार-तार कर दिया।   "डाकसाहब! यह भी एक नियतिवादी ख़्याल है। मैं कोई हरिश्चंद्र नहीं हूँ जो सत्य और असत्य की बात करूँ! मैं साधारण बात कर रहा हूँ। नागरिक अधिकार की बात कर रहा हूँ। क्या हमें इतना भी हक़ नहीं कि हम कीचड़ में सुअरों की ज़िंदगी न जीएँ? आप तो अघोरी बाज़ार के पहले मोड़ पर क्लीनकी खोले हुए हैं और ख़ुद आते हैं सुन्दर नगर से। कभी अंदर की सड़क पर आइए डाकसाहब! यथार्थ से सामना होने से अवधारणाएँ बदल जाएँगी।" ...

DHAI CHAAL Written by NAVEEN CHAUDHARY (एक पाठक के दिल की बात)

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ढाई चाल                                           यह एक मल्टीलेयर्ड कहानी है। जिसका आवरण राजीव प्रकाश खरे, ने बनाया है। किताब अपने अंतिम रूप में राजकमल समूह के हाथों ही पहुँचा है। जहाँ आपको मिलेगा सत्ता की हिस्सेदारी, एक बलात्कार, धर्म जाति मीडिया, छल-प्रपंच, और ढाई चाल।  हाँ! नवीन चौधरी ने इस समाज के बीच रहते हुए अपने हिस्से का काम कर दिया। अभी हाल ही में मैंने कपिल के शो पर कीकू शारदा को एक जोक मारते सुना - " जॉन भाई, आप मेरी भी बाइक उठा कर फेंक दो, पेट्रोल बहुत महँगे हो गए हैं।" (इन बनावटी इंग्लैंड एक्ससेंट) सभी हँसने लगते हैं। पेट्रोल महँगा हैं। यह सभी न्यूज़ वाले जानते हैं पर उस पर बात नहीं कर सकते वैसी स्थिति में एक सबसे ज्यादा देखे जाने वाले चैनल ने बड़ी ही मजाकिया ढंग से सबके सामने आम इंसान की परेशानी को रख दिया। सबको समझ भी आ गया और मजा भी। इसलिए हर वक्त अपनी बात कहने का एक बेहतर तरीका ढूंढ़ना चाहिए। एक सामाजिक व्यक्ति होने के नाते कॉमेडियन ,लेखक, कलाकार आदि का तो मह...

सरदार उधम सिंह फ़िल्म रिव्यु

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                            साभार :- webdunia अमूमन इतिहास की फ़िल्मों में हम देखते हैं कि उन दृश्यों संवादों को जल्दबाज़ी में या एक छोटे से फ़्रेम में समा दिया जाता है। जिससे दर्शक को कल्पना के बड़े बाज़ार में जाकर कल्पना उधार लेना पड़ता है। परंतु सरदार उधम सिंह में निर्देशक ने दृश्यों को कल्पना से जोड़कर ज़मीन पर लाकर खड़ा कर दिया है। कुछ क्षण को तो ऐसा लगा जैसे  उधम सिंह की जगह मैं अपनों की बोटियां चुन रहा हूँ। उन्हें अपने कंधों पर लाद लादकर अस्पताल पहुँचा रहा हूँ। वो जो छोटा बच्चा पानी पानी करते मरा , वो मेरी ही गोद में मरा। हर बार पूरी कहानी में एक ऐसा किरदार होता है जो मन को भा जाता है और यह ज़रूरी नहीं कि वह मुख्य किरदार हो। रेशमा यानी कि बनिता संधू एक ऐसा मूक किरदार जिसने अपने छोटे से हिस्से से दर्शकों का ध्यान अपनी ओर कर लिया। जब वह कहती है - 'हम ब्याह नहीं करेंगे और हमेशा दोस्तों की तरह साथ रहेंगे'। वह हिस्सा प्रेम में पड़े जोड़े के मासूमियत को दिखलाता है। प्रेम में विवाह हो यह जरूरी नहीं, प्रेम तो सिर्फ प्रेम है। ...

To all the Harvey Weinsteins of the world

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Left side :M. J. AKABAR.,RIGHT SIDE :PRIYA RAMANI Picture: first post           यह आर्टिकल PRIYA RAMANI  की है। जिसे इन्होंने 12-10-2017 को लिखा था। हाल ही में M. J. Akabar द्वारा लगाए गए अवमानना में न्यायालय ने RAMANI को बरी कर दिया है। इस आर्टिकल का हिन्दी अनुवाद SACHIN SH VATS ने किया है।  ...........................................................................   To all the Harvey Weinstein of the world. By: Priya Ramani  12 Oct. 2017 “We’ll get you all one day.” ..................................................................... डिअर मेल बॉस  आप ने मुझे कार्यस्थल का पहला पाठ पढ़ाया। मैं 23 की थी, आप 43 के। मैं आपके उच्च विचारों को पढ़ते हुए बड़ी हुई हूँ, और आप जैसा बुद्धिजीवी बनना सपना था। आप मेरे लिए उन सभी आदर्श कार्य करने वालों में खास थे। सभी कहते थे कि आपने भारतीय पत्रकारिता को बदल कर रख दिया, और मैं चाहती थी कि मैं आपके टीम का हिस्सा बनूँ। इसलिए हमने एक समय निर्धारित किया, आप मेरा इंटरव्यू लेना चाहते थे , द प्लस साउ...

'द' से "दिल्ली" 'द' से "दरियागंज"

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 'द' से "दिल्ली" 'द' से "दरियागंज" दरियागंज कि ताब ही इंसान का सच्चा मित्र है परन्तु वह कौन सी किताब होगी? जो मनुष्य का सच्चा मित्र हो, यह कहना बहुत मुश्किल हैं! भोजपत्र काल से लेकर आजतक हजारों सालों में करोड़ों, अरबों-खरबों किताबें लिखीं गयी होंगी और लिखी ही जा रहीं हैं।इतने सारे किताबों के बीच अपना सच्चा साथी ढूँढना कितना मुश्किल है। इस सवाल का जबाब नहीं हैं मेरे पास कि वो किताब मुझे कब मिलेगी जिसे मैं यह कह पाउँगा की यह मेरा सच्चा साथी हैं, मित्र है।  अपने सच्चे साथी की खोज में 27 दिसम्बर 2020 को सुबह 9 बजे हम निकलें। हमने तय किया कि आज द-से-दिल्ली के द-से-दरियागंज घूमने चलेंगें। GTB नगर बस स्टॉप से दरियागंज के लिए 901 नम्बर की बस ली और हम चल दिये। सड़क पर बिछी किताबें                                            इस भ्रमण की योजना हम दो व्यक्ति ने मिलकर तय किया था। एक मैं और दूसरे मेरे प्रिय अंशु भैया।( अंशु चौधरी , संस्थापक ,चिंतन साहित्यिक संस्थान, दिल्ली विश्वविद्याल...

घर ना जाने का निर्णय

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नूतन:- गूगल की मदद से दायें कान में पानी चले जाने की वजह से बहुत दर्द हो रहा था। दिनभर मोबाइल और किताबों की मदद से खुद को व्यस्त रखा था। कोई भी दर्द रात को ज्यादा होता हैं जब आप सोने जाओ, और पूरे दिन को याद करो। तो आपको आपका दर्द भी याद आजाता हैं, मुझे याद हैं जब मुझे जख्म हो जाता या बुखार रहता तब भी मैं खेलने चला जाता, वापस जब घर आता तो मुझे दर्द या बुखार का याद आता, वैसे ही कल रात हुआ , शाम में छत पर बैठा था तब तक सब सही था। लेकिन रात के 8 बजे के बाद कान का दर्द इतना बढ़ गया था कि मुँह नहीं खुल रहा था। थोड़ा थोड़ा दर्द की वजह से अंदर ही अंदर बुखार जैसा लग रहा था। इस कोरोना के समय मे बुखार की पीड़ा बुखार के डर के सामने कुछ नहीं,  मुझे भूख लगी हुई थी। और दर्द भी हो रहा था। पिछले 2 महीने से ज्यादा दिनों से मैं अकेला हूँ। दिल्ली के एक कमड़े में, बहुत ही अजीब निर्णय था मेरा यहाँ रुक जाना, पर मेरा मन गाँव जाने का नहीं हुआ था।इसके पीछे बहुत सारे कारण थे।जिसमें सबसे बड़ा कारण था। कि मैं अकेले रहकर सीखना चाहता था , कैसी जीते हैं, मेरा रूम पार्टनर बहुत अच्छा हैं ...

बीस दिन बीत गये✔️☑️✅✔️☑️✅

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जलना तो हैं हीं बीस दिन बीत गए✔️✅☑️✔️✅☑️ ✔️ हर शाम मुझे सिर्फ एक दिन कटने का अहसास दिलाता हैं, अब तो सपने भी डराने वाले आते हैं। खुश रहने की कोई वजह नहीं हैं मेरे पास। किताबें नहीं पढ़ पाता हूँ। कुछ भी ऐसा नहीं हैं जिससे लगें की मैं इसके लिए जिंदा हूँ। हर पल मौत के करीब जा रहा होता हूँ। सुबह बस अब होती हैं। सुबह के साथ मैं नहीं होता। सूरज की मुलायम किरणें अब आँखों में चुभती हैं। 24 घन्टे में सबसे प्यारा मुझे रात हीं लगता था। अब रात भी गुजारना मुश्किल हैं। दिल में कोई अहसास बचा नहीं हैं। अपनों से अब फ़ोन पर बातें करने का मन नहीं करता। उनसे बातें करना मुझे अकेला होना याद दिलाता हैं। जिन सीढ़ियों पर चढ़कर मैं छत पर आराम करता था। वो सीढियां मुझे कहीं और लें जाती हैं। शायद किसी अँधेरे में , किसी सन्नाटे में। जहाँ मैं जोर जोर से चिल्ला रहा होता हूँ। पर मेरी आवाज सौ गुना तेज मुझे हीं सुनाई देती हैं। मैं कान बन्द कर घुटनों में दबा लेता हूँ। एक छोटे बच्चे की तरह जो माँ-बाप के झगड़े से डरा हुआ हो,, उस बच्चे को  लगता हैं कि वो अपनी कान बन्द कर लेगा तो माँ-बाप झगड़ा नहीं करेंगे। आँखों ...