एक था डॉक्टर एक था संत :- अरुंधति रॉय
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| एक था डॉक्टर एक था संत (मुख्य पृष्ठ) |
""एक था डॉक्टर एक था संत"" किताब को तीन खंडों में मैंने पढ़ा जिसमें दो खंडों को लिख चुका था। अभी मैं इस पूरे किताब के बारे में एक साथ लिख रहा हूँ। इसमें पहले दो खंडों को शुरू में जोड़ दिया हैं। आखरी खण्ड अभी लिख रहा हूँ।
पहला खण्ड
आज मैं "एक था डॉक्टर एक था संत" पढ़ना शुरू किया, जिसे लिखा हैं अरुंधति रॉय Arundhati Roy ने और हिंदी अनुवाद :-अनिल यादव 'जयहिंद', रतन लाल ने किया हैं। इस किताब का प्रकाशन Rajkamal Prakashan Samuh ने किया हैं। इस किताब का विषय आंबेडकर-गाँधी सवांद जाति,नस्ल और 'जाति का विनाश' हैं।
अरुंधति भूमिका में हीं इस किताब की मंसा स्पष्ट करती हुई लिखती हैं कि एक था डॉक्टर एक था संत को मूल रूप से डॉ.बी.आर. आंबेडकर लिखित प्रसिद्ध लेख जाती का विनाश (1936) के टिका सहित संस्करण की प्रस्तावना के रूप में लिखा गया था।
अरुंधति लिखती हैं कि आंबेडकर का यह भाषण कभी दिया ही नही गया ना देने की भी वजह को उन्होंने लिखा हैं। किताब में साक्ष्य, प्रमाण का भरपूर इस्तेमाल किया गया हैं। आंकड़ों का जोड़ घटाव से वह जातिगत विभिन्नता को दर्शाती हैं।
अरुंधति लिखती हैं कि शांति के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार के लिए मलाला के नाम की घोषणा की गई परन्तु सुरेखा भोतमाँगे का नाम कोई नहीं जानता, काम तो सुरेखा का भी उतना ही महत्वपूर्ण था।इंसाफ की लड़ाई में उसने क्या नहीं गवाया,पर मिला क्या? कुछ नहीं , इंसाफ तक नहीं मिल पाया।,अरुंधति फिर कुछ आँकड़े सामने रखती हैं और कहती हैं कि व्यपार ,राजनीति ,सरकार ,सरकारी कर्मचारी, न्यायधीश,मीडिया ,प्रेस सभी जगह उच्च जाति के लोगों का बोल बाला हैं।
दूसरा खण्ड
आज का दिन फिर से किताबों के पन्नों के बीच हीं गुजर गया.शाम कब हो गयी पता भी नहीं चला, आज भी मैं अरुंधति की किताब पढ़ रहा था।उन्होंने गाँधी और अम्बेडकर पर गजब मेहनत किया हैं। जो किताब में परिलक्षित होता हैं।
अरुंधति कहती हैं- अंबेडकर बहुत लिखते थे,और बहुत सी पुस्तकों के लेखक हैं।यह दुर्भाग्य हैं कि जैसे गाँधी ,नेहरू या विवेकानंद द्वारा लिखित पुस्तकें पुस्तकालयों और किताब की दुकान की अलमारी में चमकती रहती हैं।अंबेडकर की पुस्तकें ढूंढ़ी नही मिलती।
शायद यहीं वजह हैं कि दलित साहित्य को वो सम्मान नहीं मिल पाया हैं,दलित व्यक्ति उच्च काम के योग नहीं समझे जाते,वैसे ही दलित साहित्य उच्च कोटि का नही समझा जाता,जबकि दलित साहित्य में सच्चाई और ईमानदारी का रक्त मिला होता हैं। दलित साहित्य स्याही की जगह लाल रक्त से लिखा होता हैं।
अरुंधति कहती हैं-इतिहास ने आंबेडकर के साथ बहुत ही निर्दयतापूर्ण व्यवहार किया।इतिहास ने आंबेडकर को पहले कालकोठरी में बंद कर दिया और फिर महिमामण्डित कर दिया। इतिहास ने आंबेडकर को अछूतों का नायक बना दिया , घेटो-बन्द बस्तियों का राजा। इसने अंबेडकर के लेखों को दुनिया की नजरों से छिपा दिया । आंबेडकर बाकी इंकलाबी बौद्धिकता पर इतिहास ने डाका डाला और तेज धार जबान को भोथड़ी करने की कोशिश की।
जाति का विनाश उस भाषण का लिखित रूप हैं जिसे अम्बेडकर 1936 में विशेषाधिकारप्राप्त जाती के हिंदुओं के समक्ष लाहौर में देना था। यह आर्य समाज की परिवर्तनवादी शाखा थी। उन्होंने डॉ से भाषण के लेख की अग्रिम नकल माँगी । जब उन्होंने इसे पढ़ा तो आम्बेडकर को एक पत्र लिखा जिसमे उन्होंने वेद शब्द को छोड़ देने पर बल दिया। परन्तु आम्बेडकर ने अपने भाषण में बदलाव को स्वीकार नहीं किया और जिसके वजह से कार्यक्रम रद्द कर दिया गया।
अरुंधति आगे लिखती हैं, 1925 में डॉ केशव हेडगेवार ने एक हिन्दू राष्ट्रवादी संघटन RSS की स्थापना कर दी थी। मुजें उस समय rss के सिद्धान्तकार थे। मुंजे इटली गए और मुसोलिनी से मिले , और फासीवाद से प्रभावित होकर स्टॉर्म ट्रूप्स के अपने दस्ते बनाने शुरू कर दिए।द्वितीय विश्वयुद्ध के समय हिटलर और मुसोलिनी आरएसएस के आध्यात्मिक और राजनीतिक गुरु थे।आरएसएस ने फिर जमर्नी के तर्ज पर एलान किया कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र हैं और मुसलमान यहूदियों की तरह हैं। 1939 में आरएसएस के हेड गोलवलकर अपनी किताब वी,आवर नेशनहुड डिफाइंड में लिखते हैं जो कि आरएसएस की बाइबिल मानी जाती हैं।
"" अपनी जाति और संस्कृति की पवित्रता बनाये रखने के लिए ,जर्मनी से समय नस्ल के यहूदियों को हटाकर ,अपने देश का शुद्धिकरण करके ,पूरी दुनिया को चौका दिया हैं।नस्ल के गर्व अपने उच्चतम स्तर और प्रकट हुआ हैं। यह अच्छा सबक हैं हम हिंदुस्तान में रहने वालों के लिए ,हमे इससे सीखना और लाभ उठाना चाहिए।""
तीसरा खण्ड(अंतिम)
आज जब मैंने "एक था डॉक्टर एक था संत" को पूरा पढ़ कर आत्मसात कर लिया हैं तब मैं आगे लिख रहा हूँ कि गाँधी महान थे,महात्मा भी थे,कुशल राजनीतिकार थे, साथ हीं महान धर्म उपासक थे। परंतु दलित ,अछूतों और अधिक निचली जातियों के लोगों के साथ अन्याय किया।जिसका ज्ञान उन्हें जीवन के उत्तरार्द्ध , मृत्य के करीब हुआ।
अरुंधति कहती हैं जनवरी 1948 में ,बिड़ला हाउस में प्रार्थना सभा के दौरान गोली मारकर गांधी की हत्या कर दी गयी। उनका हत्यारा नाथूराम गोडसे एक ब्राह्मण था।वह हिन्दू महासभा और आरएसएस का पूर्व कार्यकर्ता था। गोडसे यदि ऐसा सम्भव है,तो , एक अति आदर भाव रखने वाला हत्यारा था। हत्या से पूर्व उसने गाँधी को प्रणाम नमन किया और फिर पिस्तौल का घोड़ा दबा दिया। वो अपनी जगह से हिला भी नहीं। टस से मस तक नही हुआ , उसने खुदकुशी तक नही की।
अपनी पुस्तक में गोडसे लिखता हैं:
भारत में साम्प्रदायिक मताधिकार, पृथक निर्वाचिका और इसी प्रकार की नीतियों ने देश की एकजुटता को पहले ही बहुत कमजोर कर दिया था। ऐसी और भी घटनाएं अतिशीघ्र होने वाली थी । अंग्रेजों द्वारा साम्प्रदायिक तरफदारी की मनहूस नीतियाँ, दृढ़तापूर्वक और निःसंकोच अपनाई जा रही थी। गांधी जी को इन्हीं कारणों से हिंदुओ और मुसलमानों के निर्विवादित नेता बनने में बहुत मुश्किल आ रही थी,जैसे कि वे दक्षिण अफ्रीका में थे ।
गांधी के हत्यारे को लग रहा था कि वह महात्मा को खुद अपने स्वयं से बचा रहा हैं। गोडसे और आप्टे कब फाँसी के तख्ते पर चढ़ रहें थे तो उनके हाथ में भगवा ध्वज,अविभाजित भारत का मानचित्र और इसे विडम्बना ही कहेंगे ,भगवदगीता की एक प्रति थी। उसी गीता की जिसे गांधी अपना आध्यत्मिक शब्द कोष कहा करते थे।
अगर गोडसे के इस रूप को देखे तो गोडसे किसी आत्मघाती हमलावर से कम नही लगा रहा था ,जिसके अंदर मृत्य का कोई भय मात्र भी नही था। और धर्म ग्रंथ जैसे गीता को अपने हाथ मे रख कर मरना मतलब, उच्च कोटि का हमलावर, हत्यारा
अरुंधति आगे लिखती हैं:- गांधी ने अपने प्रयोग में अपनी पत्नी और अन्य लोगों को भी शामिल कर लिया ,उनमें से कुछ तो इतनी छोटी थीकि शायद उन्हें पता भी नही की उनके साथ क्या हो रहा हैं.
जब आखरी समय मे गांधी (70 वर्ष) दो कम उम्र की युवती के साथ सोना शुरू कर दिया।मनु और आभा,जिनकी उम्र 17 वर्ष होगी। (ये गांधी की बैसाखी कहीं जाती थी।) गांधी का कहना था कि वे ऐसा इसलिए करते हैं कि वे अपने काम इच्छाओं को पराजित करने में किस हद तक सफल असफल रहें हैं।, इसका सही आकलन कर सकें। सहमति और औचित्य के अति विवादास्पद और चिंतन करने वाले मुद्दों को छोड़ दिया जाय ,तो भी यह सवाल बनता हैं कि बालिकाओं के मन मस्तिष्क पर उसका क्या प्रभाव पड़ा होगा,यदि प्रयोग और चिंतन को भी छोड़ दिया जाय तो प्रश्न खड़ा होता हैं कि गांधी का दो (या तीन या चार) स्त्रियों के साथ एक ही बिस्तर पर सोना और उन प्रयोगों के निष्कर्ष के आधार पर मूल्यांकन करके इस परिणाम तक पहुँचना की गांधी ने अपने विषम लिंग काम इच्छाओं पर काबू पा लिया हैं या नही इससे यह स्पष्ट होता हैं कि वे स्त्री को एक विशिष्ट व्यक्ति ना मानकर एक श्रेणी या वर्ग के रूप में रखा
गांधी स्त्री को एक प्रयोग की वस्तु के रूप में देखा चाहे वो स्त्री उनकी पौत्री ही थी लेकिन वो पूरी स्त्री जाति का नेतृत्व कर रही थी।
अरुंधति :- गांधी सफाईकर्मी की हड़ताल के खिलाफ थे
""कुछ मामलात ऐसे हैं जिन पर हड़ताल करना गलत होगा। सफाईकर्मी की शिकायते भी उसी श्रेणी में आती हैं। सफाईकर्मियों की हड़ताल के विरुद्ध मेरी राय 1897 में बनी जब मैं डरबन में था एक आम हड़ताल करने के लिए वहाँ बहस हो रही थी। और सवाल उठा कि क्या भंगियों को भी उस हड़ताल में शामिल होना चाहिए ? मैंने विस् प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया जैसे इंसान वायु के बिना जिंदा नही रह सकता , उसी प्रकार वो ज्यादा समय तक बिना साफ सफाई के जिंदा नही रह सकता , कोई ना कोई महामारी फैल कर रहेगी खासतौर पर आधुनिक मल निकासी का काम रुक जाए । एक भंगी अपना काम एक दिन के लिए भी नही छोड़ सकता और न्याय हासिल करने के उसके पास और भी कई रास्ते हैं।
ऊपर की बातों से यह स्पष्ट होता हैं कि भंगी जाति के लोगो के पास विरोध का हक नही हैं। न्याय हासिल करने के और तरीके हैं। उस बात का जिक्र भी नही हैं। क्या भंगी सब दिन सफाई ही करें। उसका शाशन सत्ता में हिस्सेदारी ना हो??
मंदिर के दरवाजे को खोलने के संबंध में गांधी के प्रायोजक जी डी बिड़ला ने एक इंटरव्यू में कहा था"स्पष्ट कहूँ तो हम मन्दिर का निर्माण करते हैं ,लेकिन मंदिर में विश्वास नही करते । हम मंदिरों का निर्माण एक किस्म की धार्मिक मानसिकता फैलाने के लिए करते हैं।""
इस समय बहुत सारे मंदिर को खोले जाने की घोषणा हुई जिसमें से बहुत सारे मन्दिर ने ठेंगा भी दिखाया और कितने अपनी बात से पलट गए।
2002 का गोधरा कांड
रेलवे स्टेशन पर एक रेलगाड़ी में रहस्मय ढंग से आग लग जाती हैं।अट्ठावन हिन्दू तीर्थ यात्री जलकर मर जाते हैं। सबूत ना होने की वजह से मुसलमान को अपराधी घोषित कर गिरफ्तार कर लिया गया।अगले कुछ दिनों तक विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के नेतृत्व में सामुहिक हत्या और लूटमार का सिलसिला चला जिसमे दो हजार से ज्यादा लोगो की हत्या हुई जो अधिकतर मुसलमान थे।हजारों महिलाओं का भीड़ में सामुहिक बलात्कार किया गया। उन्हें दिन के उजाले में जिंदा जला दिया गया।इन सब के बाद 287 लोगो को गिरफ्तार कर सजा हुई , जिसमे से 286 मुसलमान और 1 सिख था।इनमे से ज्यादातर अभी भी जेलों में सड़ रहे हैं।
सवाल ये हैं कि अगर मुसलमान आतंकवादी थे तो ये दंगाई कौन था???।दलित लेखक केसरिया तले खून : दलित-मुस्लिम टकराव का मिथक में लिखते हैं कि 1577 हिन्दू जो गिरफ्तार किए गए उनमें से 747 दलित थे, 797 अन्य पिछड़ा वर्ग ,उन्नीस पटेल थे। दो बनिया और दो ही ब्राह्मण थे। एक भी नरसंहार उन बस्तियों पर नही हुआ जहाँ मुस्लिम और मुसलमान एक साथ रहते थे।
एक साक्षत्कार में उनसे पूछा गया कि जो कुछ भी सन 2002 में हुआ क्या उस पर उन्हें खेद हैं??
उनका जबाब था कि "चाहे हम कार चला रहे हो या पीछे बैठे हों तो भी यदि कोई कुत्ता का पिल्ला पहिये के नीचे आ जाय तो यह दर्दनाक होगा कि नही होगा????????
नरेंद्र मोदी के द्वार जनता को कुत्ते के पिल्ले से तुलना करना कितना सही था इसका अंदाजा मुझे नही लगता हैं। इनबातो से यह स्पष्ट होता हैं कि उनको जनता की कितनी चिंता थी ।
आखिरी कुछ पंक्ति में अरुंधति कहती हैं कि जब तक हम बाबा साहिब अम्बेडकर को पढ़ नही लेते। विद्यालयों की कक्षाओं में नही तो, कक्षाओं के बाहर ही सही ,लेकिन पढ़े जरूर। वरना तब तक हम वही रहेंगे, जिन्हें बाबा साहिब ने हिंदुस्तान के 'रोगग्रस्त पुरुष और महिलाएं 'कहा था। और जिन्हें भला चंगा और स्वस्थ होने की कोई चाहत नही हैं।
अरुंधति की मदद से मुझे आजादी और दलित संघर्षों को जीने का मौका। अछूतों के हक का सही मतलब समझ आया। आरक्षण जैसे दलित मजबूत पक्षो की जरूरत समझ मे आयी।
मैं अरुंधति और राजकमल प्रकाशन का तहे दिल से शुक्रिया करता हूं। इस किताब को पढ़ना गंगा स्नान के बाद जैसे पवित्र महसूस होता हैं बिल्कुल वैसे ही लग रहा हैं।
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| शुक्रिया |


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